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chashme-se-dur

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क्यूँ तारीफ में तुम्हारे पढूँ मैं चन्द गजलें, बस मुस्कुराते हुए तुम अच्छी लगती हो । शुरुवात करूँ कैसे परेशान सा हुआ दिल, रंगीन सी है दुनिया रंगीन सी ये महफ़िल, रूप भी है सादा, काजल लगाते हुए अच्छी लगती हो... क्यूँ तारीफ में...... बरसात भी नही है, न सावन की काली घटायें, खुली तुम्हारी जुल्फें, बादल से है छा जायें, रखो इन्हें तुम यूँ ही, खुली जुल्फों में और भी हंसी लगती हो... क्यूँ तारीफ में तुम्हारे पढूँ मैं चन्द गजलें, बस मुस्कुराते हुए तुम अच्छी लगती हो ।